वस्ल हा़स़िल न हुआ ग़म भी कोई वा न हुआ
बारहा हम ने किया याद ख़ुदाया न हुआ
बुलबुल् इमरोज़ रवाँ शुद तरफ़े-बाग़े-दिगर
नख़्लो-सीराब कोई हा़स़िले-स़हरा न हुआ
है दिया दिल को दिलासा हमने यूँ तो बहुत
मगर इस बार हुआ वो कि दिलासा न हुआ
इस तरह बाद का रुकना धड़कन रोकता है,
इस वजह से फिर चिड़ियों का चहकना न हुआ।
बेख़बर दिलबरे-अय्यार को दिल जब से दिया
मैं फिर अपने दिले-आज़ार का गोया न हुआ।
Bikhabar Khoshdel
Bikhabar Khoshdel
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