Monday, 13 March 2023

غزل ग़ज़ल-५

 वस्ल हा़स़िल न हुआ ग़म भी कोई वा न हुआ

बारहा हम ने किया याद ख़ुदाया न हुआ


बुलबुल् इमरोज़ रवाँ शुद तरफ़े-बाग़े-दिगर

नख़्लो-सीराब कोई हा़स़िले-स़हरा न हुआ


है दिया दिल को दिलासा हमने यूँ तो बहुत

मगर इस बार हुआ वो कि दिलासा न हुआ


इस तरह बाद का रुकना धड़कन रोकता है, 

इस वजह से फिर चिड़ियों का चहकना न हुआ। 


बेख़बर दिलबरे-अय्यार को दिल जब से दिया

मैं फिर अपने दिले-आज़ार का गोया न हुआ। 

Bikhabar Khoshdel

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A personal brief note on the Persian poetry of Agha Jawad and Dr. Balram Shukla

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