Saturday, 14 October 2023

On Zindeginama of Bhai Nandlal Sahib

 ज़िन्दगीनामा: भाई नंदलाल सिंह 'गोया'(1633-1713)

             'ज़िन्दगी के प्याले में बंदगी का अमृत'

       जहाँ फ़ारसी काव्य परम्परा में दक़ीक़ी और रूदकी को पहले कवि और बाबा-ए-फ़ारसी के नाम से जाना जाता है, फ़िरदौसी को दोबारा भाषा को ज़िंदा करने का श्रेय दिया जाता है, ख़य्याम की रूबाईयों में जीवन के हर एक क्षण को जीने की हिदायत है,रूमी इश्क़-ओ-वहदत की तार छेड़ते हैं,सा,दी ने शाइरी में ग़ज़ल की विधा में अपरिहार्य योगदान दिया है और बड़े बुज़ुर्ग की तरह जीवन के हर पक्ष में हिदायतें दी हैं, ख़्वाजा-ए-शीराज़ को 'लिसानुल-ग़ैब' का सम्मान प्राप्त है और उनके दीवान से फ़ाल निकाले जाते हैं और हुक्मनामे लिए जाते हैं, और सबक़-ए-हिंदी में बेदिल दिहलवी को उनकी शायरी में अनोखेपन और उनकी दूर-दराज़ से लेकर बिम्बों को शाईरी में आत्मसात कर लेने की कला के कारण जाना जाता है और खुसरौ व बू अली क़लन्दर अपना अलग मुक़ाम रखते हैं। वहीं भाई नंदलाल 'गोया' की तरफ़ कम ही नज़र पड़ी है।

        भाई नंदलाल सिंह 'गोया' गुरू गोबिंद सिंह के प्रिय सिख थे। भाई नन्दलाल फ़ारसी ही नहीं अरबी के भी विद्वान थे और वे शहज़ादे मुअज़्ज़म के उस्ताद थे। 

  उनकी शायरी का मुख्य तत्व या कहें कि आधार 'बंदगी' ही है। और उनकी एक किताब का नाम 'बंदगीनामा' भी है, जो फ़ारसी की मस्नवी शैली में लिखी गई है। बंदगीनामा को पढ़ने के बाद गुरू गोबिंद सिंह जी ने इसका नाम 'ज़िंदगीनामा' रख दिया और इसी की बह्र में एक शे,र कहा:

 زآب حیوان پر شده چو جام او

زندگینامه شده زآن نام او

     ज़ाबे-हैवान् पुर शुदे चू जाम-ए-ऊ

         ज़िन्दगीनामे शुदे ज़ान् नाम-ए-ऊ

(अर्थात यह(ग्रंथ) अमृत से भरा हुआ है, इसलिए इसका नाम 'ज़िन्दगीनामा' होता है।)


(गुरू साहिब ख़ुद एक योद्धा होने के साथ-साथ फ़ारसी के कवि भी थे। उन्होंने ख़ुद फ़ारसी की मस्नवी शैली में तत्कालीन बादशाह औरंगज़ेब को दो पत्र 'ज़फ़रनामा' और 'फ़तहनामा' लिखे, जिससे उनकी काव्य कला और शिल्प पर प्रकाश पड़ता है और उनकी अन्य रचना 'जापु साहिब' के मधुबार छन्द में 'ज़फ़रनामा' के शे'रों को बड़ी ही शिल्पता से प्रयोग किया गया है। तो इसमें कोई दोराय नहीं की 'बंदगीनामा' एक सटीक नाम से इतर दूसरा नाम 'ज़िन्दगीनामा' अध्ययन पश्चात् ही दिया गया है।)

       फ़ारसी काव्य परम्परा में बंदगी पर इतने अश्आर और किसी शाइर ने नहीं कहे होंगे जितने कि 'गोया' ने कहे हैं, मौलाना की मस्नवी को छोड़कर, जिसके बारे में कहा गया है:مثنوی معنوی مولوی/هست قرآن در زبان پهلوی "मस्नवीये-मा'नवीये-मौलवी/ हस्त क़ुरआन् दर ज़बाने-पहलवी"(मौलाना रूमी कृत अर्थपूर्ण(ईश्वरीय भेदों) का काव्यग्रंथ पहलवी (मध्य फ़ारसी) भाषा की क़ुरान है)। गोया पर हाफ़िज़ के साथ-साथ मौलाना का भी प्रभाव है। मौलाना का एक शे'र देखें:

زندگی آمد برای بندگی

زندگی بی بندگی شرمندگی

            "ज़िन्दगी आमद बराये-बन्दगी

              ज़िन्दगी बी बन्दगी, शर्मिन्दगी"

(ज़िन्दगी बंदगी के लिए मिली है, बिना बन्दगी केवल शर्मिंदगी है।)

और अब गोया के द्वारा कुछ अश्आर देखें:

بنده تا باشد برای بندگی

غیر حرف حق همه شرمندگی

             "बन्द: ता बाशद बराये-बंदगी

              ग़ैरे-हर्फ़े-हक़ हमे शर्मिन्दगी"

(बंदे का तो काम ही बन्दगी है, बिना 'ज़िक्र' जीवन शर्मिंदगी है, व्यर्थ है।)

این وجود خاک پاک از بندگیست

گفتگو های دگر شرمندگیست

           "ईन् वजूदे-ख़ाक पाक'ज़ बन्दगी-स्त

            गुफ़्तगू-हाये-दिगर शर्मिन्दगी-स्त"

این همه از دولت این بندگیست

زندگی بی بندگی شرمندگیست

           "ईन् हमे अज़ दौलते-ईन् बन्दगी-स्त

            ज़िन्दगी बी बन्दगी शर्मिन्दगी-स्त"

       ज़िन्दगी के हर शे,र में बन्दगी का फ़लसफ़ा प्रकट होता है। यह उनकी काव्य कला की ख़ूबसूरती ही कही जा सकती है कि उन्होंने अलग-अलग अश्आर में अलग-अलग बिम्बों के द्वारा बन्दगी ही के फ़लसफ़े को दोहराया है।यहाँ तक की उनकी सभी रचनाओं में बंदगी का ही फ़लसफ़ा/ बन्दगी ही मुख्य मौज़ू है। चाहे उनकी ग़ज़लियात हों या 'गंजनामा', सभी में बंदगी का रसास्वादन किया जा सकता है। प्रेम और बन्दगी ही उनकी शाइरी के मुख्य मौज़ू हैं। बेदिल और ख़ुसरौ के बाद अगर किसी क्लासिक शाइर का नाम आता है तो वे 'गोया' हैं। अगर हम उनकी किताब को कहीं से भी खोलें तो जिस भी शे'र पर निगाह पड़ेगी, उसमें से बन्दगी ही झलकेगी। 

  बंदगीनामा से उनके कुछ रेंडम अश्आर देखें:

گر تو خوانی نسخه ای از شان عشق

می شوی سر دفتر دیوان عشق

       ० गर तु ख़ानी नुस्ख़:ई अज़ शाने-इश्क़

          मी-शवी सर दफ़्तरे-दीवाने-इश्क़

(अगर प्रेम की शान वाली पुस्तक से एक नुस्ख़ा(पाठ) पढ़लोगे, तो तुम्हारा नाम भी इश्क़ की शाइरी के दफ़्तर के ऊपर-ऊपर होगा।)

یا الهی این دلم را شوق ده

لذتی از شوق خاص و ذوق ده

       ० या इलाही ईन् दिलम् रा शौक़ दह्

          लज़्ज़ती अज़ शौक़े-ख़ासो-ज़ौक़ दह्

(हे ईश्वर! मेरे ह्रदय,मेरे दिल को शौक़ दो ताकि मैं तेरी बन्दगी में लुत्फ़ो-लज़्ज़त हासिल कर सकूँ।)

معنی این کو به کو دانی که چیست

حمد گو دیگر مگو اینست زیست

      ० मा'नी-ये-ईन् कू-ब-कू दानी कि: चीस्त्

         हम्द गू दीगर मगू ईनस्त जीस्त्

(जानते हो इस गली से उस गली में भटकने का क्या मतलब है? उसकी सिफ़्त-ओ-सलाह करो, और कुछ न कहो, यही ज़िन्दगी है।)

حرف دیگر نیست غیر از یاد حق

یاد حق هان یاد حق هان یاد حق

       ० हर्फ़े-दीगर नीस्त ग़ैर अज़ यादे-हक़

         यादे-हक़ हान् यादे-हक़ हान् यादे-हक़ 

(रब की याद के बिना कोई दूसरा शब्द न पढ़, रब की याद हाँ, रब की याद हाँ, रब की याद।)

در دل گویا هوای شوق بخش

بر زبانش ذره ای از ذوق بخش

      ० दर दिले-गोया हवाये-शौक़ बख़्श

         बर ज़ुबान'श ज़र्रेई अज़ ज़ौक़ बख़्श

(हे प्रभू! अकाल पुरख! गोया के दिल में प्रेम की तीव्र इच्छा बख़्श, गोया की जीभ पर अपने ज़ौक़(परमानन्द) का किनका बख़्श।)

صاحبانرا بنده بسیار آمده

بنده را با بندگی کار آمده

      ० साहिबान् रा बन्द: बिस्यार् आमदे

         बन्द: रा बा बन्दगी कार् आमदे

(साहिबों/ बादशाहों के हज़ारों सेवक/बंदे होते हैं, बन्दे का काम तो उनकी बन्दगी करना है।)

    इसी तरह ज़िंदगीनामा के हर एक शे,र में बंदगी ही झलकती है। उनकी रचना में ख़्याल की बारम्बारता उनके काव्य में बन्दगी के रसास्वादन को जगाए रखती है और प्रेम और बंदगी की चाश्नी में पूरा मज़ा, लज़्ज़त देती है।

तो ज़िन्दगीनामा को 'ज़िन्दगी के प्याले में बन्दगी रूपी अमृत' कहना कोई अतिश्योक्ति नही होगी।

#bikhabar_khoshdel (June, 2021:Sriganganagar)

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